नूतन स्वरूप

विधा-कहानी,      शीर्षक- नूतन स्वरूप   अम्माजी बड़ी होती तनुजा के देख कर पड़ोसिन से बोली,”देखो ! वैभव की माय ,बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी होती है. ताड़ के पेड़ जैसी.”

हर दिन अम्मा को चिन्ता सता रही थी कि कैसे तनुजा के हाथ पीले करे? तनुजा के पिता को लगातार  वह कहती रहती,” देखो तनुजा के बापू, अब तो तनुजा की  बी०ए० भी पूरी होने वाली है,कुछ कीजिये हाथ-पर-हाथ रख कर बैठने से कुछ नही होगा?”

उस के पिता ‘मेट्रिमोनियल- कालम’ देख कर पत्र व्यवहार करते रहते थे.आखिर वह दिन आगया  जब तनुजा  को तुमुल ने पसन्द कर लिया.तुमुल इन्जीयरिग में पढ़ रहा था इस लिये तनुजा के पिता  ने  सोचा  अच्छा है पढ़ाई पूरी होते होते, एक ही साल में अच्छी  नौकरी मिल जायेगी.  इस लिये  जल्दी ही  रिश्ता पक्का कर दिया.

शादी के सब रीति रिवाज पूरे हो जाने पर तुमुल की भाभियों ने  दोनों को कमरे में  ढ़्केल  कर  हँसते हुए बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया.

लम्बा घूघट निकाले गहनों से लद् दी तनुजा को देख पहले तो तुमुल ने उस का मजाक बनाते हुए जोर से ठहका लगाया  और  फिर   बोला,”तनु मैं तो वही तुमुल हूँ  जिसे तुम बहुत बार कालेज में मिल चुकी हो. उस के सामने यह सब नाटक करने की जरूरत नहीं है.”

तनुजा ने उस के कथन को गम्भीरता से नहीं लिया.उस ने अपनी  सहेलियों से सुना था ऐसा करने पर पति बड़े दुलार से  उस का घूँघट हटायेगा.

तनुजा खुली आँखों से सपनों की दुनिया में खो गयी.उस ने देखा कैसे प्यार से तुमुल उस का एक-एक गहना  उतार रहा है.उस केबाद उस ने उपहार स्वरूप गहनों का डिब्बा निकाला और तनुजा को दिखाया वह गहने  उसे ब हुत पसन्द आये. फिर धीरे से तनुजा बोली,”मैं भी आप के लिये एक उपहार खुद हाथों से बना कर लायी हूँ.”यह कह कर उस ने एक बैग से स्वेटर निकाल कर दिया.जिसे पहन कर वह झूम उठा.आज दोनों ब हुत खुश थे.पर यह क्या? कुछ  देर के बाद वह द हाडा,” तनुजा तम्हें क्या हो गया है? तुम ने अभी तक कपड़े भी नहीं बदले.उस के कडे  शब्द सुन मानोम कि उस की तन्द्रा टूट गयी.वह बोली ,” पता नहीं कैसे आँख लग गयी थी।

कुछ खीज कर तुमुल बोला,” अच्छा जल्दी कपडे बदलो.मुझे तो जोर से नीद आ गयी है.देखो तुम यहाँ बिस्तर पर सो जाना मैं सोफे पर सो जाता हूँ.किं कर्तव्य विमूढ़ सी वह सोचती रही उस के सपनों का क्या हुआ?

जीवन की यात्रा आरम्भ होने पर उसे  हर दिन ताने  सुनने को मिलते  वह हर दिन हर काम को चुनौती समझ  बड़ी सतर्कता से करती पर उसे मिलती थी तो केवल आलोचना!!

आखिरकार एक दिन उसने निश्चय कर लिया कि अब वह सिद्ध कर देगी कि वह नारी होते हुए भी पुरूष से किसी प्रकार कम नहीं.अब वह समय चला गया जब नारी को अबला कहा जाता था.शादी से पहले  वह घर के पास एक स्कूल में पढाती थी.

उसी अनुभव के आधार पर उस ने  निश्चिय किया कि वह अध्यापन को  अपनी अभिव्यक्ति को अपना माध्यम बनायेगी.  क्षत-विक्षत आत्म बल को जागृत करने के लिये पहले उस ने  एक छोटे स्कूल  में पढ़ाना  शुरु किया.उस की अध्यापनकला  की तारीफ हर कोई करने लगा।रात दिन

कोई  करने लगा। रात दिन बच्चों के माता-पिता ट्यूशन पढ़ाने के लिये उससे अनुरोध करने लगे.परन्तु उस के पति के ताने सदैव उस के आत्म विश्वास को गिराने की कोशिश करते रहते.

परन्तु तनुजा लगातार सफलता के पथ पर आगे  बढ़्ती गयी .अपने आत्मबल और अपने पर विश्वास के सहारे.

अब तो सब से लोगों से  तनुजा के पति को उस की प्रशन्सा सुनने को मिलती. समय बीतने पर उस ने एक प्रतिष्ठित स्कूल  में प्रधानाध्यापिका का स्थान पा लिया और मन ही मन सोचती  कि आत्म विश्वास और द्द्ढ़ निश्चिय मनुष्य को हर चुनौती का सामना करने की हिम्म्त देता है जो उस ने पाया.

उस  के एक निश्चय  ने तो उस के जीवन को ही बदल दिया और साथ ही तनुजा के प्रति तनुज के विचार भी.

लेखिका-

श्री मती विनोद पड़ित,

दूर भाष-०१२४-४०४६९४०