फिर एक मधु………..

मेरी रचनायें–शोभना सम्मान-२०१३ के लिये,

 मौलिकता का प्रमाण पत्र,

प्रमाणित करती हूँ कि मेरी ये दोनो रचनायें मौलिक हैं तथा किसी भी ब्लोग ,साईट,समाचार और पत्रिका इत्यादि में अभी तक प्रकाशित नहीं हुई हैं।

लेखिका–

श्री मती विनोद पंड़ित

मेरा  परिचय–

आज जब अचानक मुझे कुछ  अपने बारे  में  लिखने  को  कहा गया तो  पल-भर  के लिये मैं  ‘सकते’  में आगयी। पर फिर धीरे-धीरे कुछ शांत-चित्त से सोचने  पर लगा एक  हकीकत  भरा  प्रयास  इस  ओर  करना भी  उचित  होगा।  मैं भी  कुछ  लिखना चाहती  हूँ। अपने ख्वाबों को,अपने  जीवन की छोटी-बड़ी अविस्मरणीय   घटनाओं को  स्मृति-पटल पर अंकित यादों को जीवन के तमाम पहलुओं को   तूलिका  से   चित्र में उकेर  व शब्दों  में  दूसरों के सामने  प्रस्तुत करना  चाहती हूँ।

अभी  मैंने  अपने  काँपी  के  पृष्टों  पर लिखना भी  नहीं सीखा था मेरे  मन में  नाटकों  और कहानियों  के  ताने-बाने  बुने जाने  लगे। मेरा  बाल्यकाल  उत्तराचंल  की  वादियों  में  प्रकृति की गोद  में बीता। जिस अवस्था  में  बालिकायेँ  गुड्डे-गुडिड्यों  से  खेलती  थी  मैं  घन्टों  मन्त्र मुग्ध  हो  अपने  मकान  की  छत पर  बैठी  प्रकृतिक  दृश्यों  को  निहारती  अघाती(थकती)  नहीं थी।आज भी रंग-बिरंगे  दृश्य  मेरे  दिमाग  पर  चित्रवत  अंकित हैं।

पिछ्ली  बार  जब  मैंने  पैतृक  घर  जाने   पर  स्वर्गीय  माँ  का  बाक्स   खोल  कर  देख  रही थी  वहाँ  पड़े  कुछ  फटे-चिट्टे  कागजों  को  देख  कर  मैं  आश्चर्य-चकित हो गयी। जरा ध्यान से  देखा तो  माँ  की  याद  ताजी  हो  आई  जिस  ने  मेरे पहली  बार लिखे ‘अक्षर’   और  लेखन कार्य  को  कितना सहेज कर  एक  सुन्दर  से  ड़िब्बे  में  रक्खा था। सच!  पुरानी  यादें  फिर   उभर  आईं। कितना प्यार था  माँ  को   अपनी  सब से छोटी संतान से!!

आज भी  भले  ही  किसी  का  मन  भाषा  सम्बन्धी  अशुद्धियाँ   देख  कर  उस  में  न  रमे। पर एक लेखक  मन ही  उस  में  साहित्य  के  विशाल  गगन  में  उड़ने  के  लिये  बेताब ,छ्टपटाते विचारों  को  देख   सकता  है।  बाल्यकाल  में  ही   माँ-बाबा और भाई-बहनों  के  प्रोत्साहन  से लेखन के  साथ-ही  साथ  चित्रकला में  भी  मेरी   रूचि दिन-दूनी,रात- चौगुनी  बढ़ने  लगी । मैंने  चित्रकला  में   सनातक  के प्रथम और  दूसरे  दोनो  सालों  में  उत्त्म  चित्रकार  का  पुरस्कार आगरा विश्वविधालय से प्राप्त किया।  इस के अतिरिक्त कई बार  पुरस्कृत  हुई।

आज-कल दिल्ली पब्लिकेशन की सभी स्थानीय पत्रिकाओं  में मेरी कहानियाँ और लेख अलग-अलग आयु के लिये समय- समय पर अलग-अलग पत्रिकाओं में  छ्पते हैं। मैं अधिकतर चम्पक –नन्हें मुन्नों  की पाक्षिक पत्रिका, मुक्ता–युवाओं के लिये राजनीतिक सामाजिक पत्रिका,  गृहशोभा-महिलाओं के लिये मासिक पत्रिका,  सुमन सौरभ–किशोरो के लिये मासिक पत्रिका,  सरिता–पारिवारिक पाक्षिक  हिन्दी मैगजीन में अपनी रचनायें भेजती हूँ।

आशा है मेरी दोनों कहानियाँ जो वास्तविकता के धरातल पर टिकी हैं तथा सच्ची हैं। पाठकों  को पसन्द आयेगी।

लेखिका–

विन्नी,

श्रीमती विनोद पंडित,

 

फिर एक मधु…..

आज बड़ी भोर ही मधु के घर खूब भीड़ जमा थी। कुछ रो रहे थे तो कुछ कानाफूसी कर रहे थे “कितनी अच्छी थी बेचारी इतना पढ़ी लिखी थी और अच्छी नौकरी करती थी फिर भी  समाज ने  उसे नहीं  छोड़ा।”

जमीन पर पड़ी थी उस की भाव विहीन ठण्ड़ी लाश आखेँ फाडे टुकर-टुकर ट्की ट्की लगाये इस दुनिया से समाज से मानों पूँछ रही थी “कुछ सवाल….”

रोते-रोते उस के माता पिता बेहाल हो गये थे ऐसा लग रहा था मानों आँसूओं  का अथाह समुद्र तो कभी रूकेगा ही नहीं।

पर ऐसा भी चलता कितने दिन आखिर आँसूओं  की भी तो कोई सीमा है।रूक गई आँसू  की झड़ी  मन के भीतर घाव छोड़ कर।

धीरे-धीरे फिर वही  मानव स्वभाव दैनिक  दिनचर्या आरम्भ हो गयी। यादों पर व्यस्तता की पर्त्त जमने लगी ।पर मधु के पिता थे कि वह कितना भुलाने  पर भी अपनी स्नेहपालिता पुत्री को भूल नहीं  पा रहे थे। रातों की  नींद तो न जाने कहाँ खो गयी थी? वह अपनी  खुली  आँखों से अतीत की एक-एक झाँकी पल-पल देखा करते थे।उस दिन को तो वह कैसे भूल सकते हैं जब उस के जन्म पर उस की दादी  ने  पिता से सहानुभूति भरे वाक्य बोली,”अरे! बिरजू का होगा रे आगे ? कहाँ से जुटायेगें दहेज इस जमाने में,ले आ गया सिर पर बोझ एक बेटी का। सिर नीचा कर देने के लिये। अभी से जोड एक-एक पैसा,पेट काट कर।”

तपाक से यह  कह कर चुप करा दिया था बिरजू  ने अम्मा को, “अम्मा ! क्या कह रही हो अनाप -शनाप?  देखना मेरी बेटी नही पूत होगी!हमारे खानदान का नाम रोशन करेगी।”

तब से बिरजू बाबू ने मन बना लिया था कि वह अपनी बेटी को अपने बेटे की तरह पालेगे पढ़ा-लिखा कर पढा लिखा, पुरुष समाज में एक इज्जतदार   और ऊँचा स्थान  दिलायेगें।

बस उस दिन से लग गये थे नये उदेश्य के लिये। सोते-जागते देखते थे रंगीन सपने अपनी मधु के लिये।

आर्थिक  स्थिति अच्छी न होने पर भी अपनी मधु के लिये । उन्होंने ‘इग्लिश मीडियम’ स्कूल  में ऊँची फीस दे कर पढाया।

धीरे-धीरे मधु जवान हो गयी । बिना किसी प्रसाधन के वह सब को अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। पर पिता का स्वपन कुछ और था वह मधु से बोले ,”बिटिया !तुम्हें कुछ  बन कर दिखाना है।

पिता की साध को रख लिया मधु ने मन में।उसी को पाने के लिये उस ने दिन रात एक कर दिया। वह दिन भी आगया जब उस ने ‘रिजर्व बैंक ‘की लिखित परीक्षा अव्वल दर्जे में पास कर ली।बिरजू बाबू के पाँव तो अब जमीन पर नहीं पड़्ते थे।

इन्टरव्यूह  वाले  दिन वह सफेद  साड़ी पहने जूड़ा बनाये और कन्धे पर पर्स लेकर जब वह चली तो सभी की नजरें आदर से झुक गयी।

इन्टरव्यूह  के कमरे में जब उस ने नमस्कार की मुद्रा में प्रवेश किया। तो एक सज्जन ने उसे “प्लीज,बी सीटिड़” कहा इस पर शालीनता से वह कुर्सी पर बैठ गई। उस की “परस्नैलटी”से उसे आधी से अधिक सफलता तो  मिल गई।अन्त वह दिन आ गया जब उस ने क्लास वन अफसर  की तरह रिजर्व बैंक ‘ज्वाइन’ कर लिया ।  मधु के पिता को लगा मानों उन के अरमान पूरे हो गये हैं।

परन्तु इस सफलत को पा लेने पर भी दुनिया का मुँह बन्द नहीं हुआ।  एक पड़ोसिन बोली,”मधु के पिता तो बेटी की कमाई खाना चाह्ते हैं। इसी लिये घर बैठा रक्खा है।”

तो दूसरी बोली,”ऐसी सुशील लड़्की के लिये लड़के की क्या  कमी है…….?”शुरू -शुरू  में  इस  बात  का  मधु के पिता पर कोई असर नहीं हुआ। पर कब तक  अनसुनी  करते?”
बस फिर वही आम तरीका ! हर समाचार पत्र का ‘मेट्रिमोनियल’ पढना। लाल पैन से निशान लगाना। फिर वही फोटो की माँग,फिर लड़्के वालों का लड़्की को लेकर उन के शहर में  आने का अनुरोध!

मधु इस प्रकार के तरीकों से खीज कर माँ से कहती,”क्या यहा बार-बार करना जरूरी है?”

मधु के पिता के अपनी लाड़्ली के साथ होने वाले व्यवहार से जब परेशान  हो जाते तब मधु की माँ उन्हें तसल्ली देते हुए कहती,”क्या करेगें मधु के पापा यह जग की रीत है?”

सगे सम्बन्धी भी कहते ,”बड़ी अफसर है तो क्या हुआ है,है तो लड़्की ही, आखिर !कब तक अनब्याही माँ -बाप व्दार पर बिठायेगें।”

न पसन्द होते हुए भी माता-पिता असुविधा का विचार करते हुए समाज के तौर-तरीके को सोच कर मूक बनी रही।

इसी तरह मधु के पिता लगातार पत्राचार करते रहे।  एक दिन डाकिया पत्र लाया जिसे देख कर उन के मुख पर मुस्कुराहट छा गयी। उन्होंने  मधु की माँ को पुकारा ,’अजी !सुनती हो ?कानपुर  वालों का सहमति का पत्र आ गया है।”

मधु की माँ ने सुख की लम्बी साँस लेते हुए मधु के पिता से लड़्के के बारे में सवाल पूछे। खुश होते  हुए  मधु  के पिता ने बताया,”लड़्के का नाम   रमेश है। उस ने ‘आई०ए०एस०’कम्पीट किया है और ऊँचे पद पर दिल्ली में लगा हुआ है। पिता ‘रिटायर्ड़ एक्सीक्यूटिव’ है। माँ भी पढी -लिखी भली औरत दिखती है। उन की कोई  ‘डिमाण्ड़’ नहीं है । खाली  अच्छे से शादी चाहते हैं।”

मधु को देखने पर ऐसा लगता था कि वह किसी बात में रूचि नहीं ले रही थी। पर रमेश की ‘स्मार्टनैस ‘पर वह भी फिदा हो गयी थी। रमेश  की चर्चा या नाम लेने पर उस के मुहँ पर, कानों तक लाली छा जाती थी। कितना सुखद अनुभव था जीवन का ?

अब टेलीफोन की आवाज भी उसे किसी अपने की आवाज की  आशंका  देती । उस का मन रमेश की आवाज टेलिफोन सुनने को करता। कितना अपना-अपना सा लगता था नाम?

इस प्रकार दोनों पक्षों की सहमति से मधु का विवाह सम्पन्न हो गया।  सभी रिश्तेदारों की भीड़ में से वह कनखियों से रमेश को देख लेती तथा छुई-मुई की तरह लज्जा उठती। उस का मुख रक्तिम हो जाता।

आज ससुराल में उस की पहली रात थी तभी किसी की कर्कश आवाज उस के कान को भेदती  हुई आयी,”अरे! लड़्की पढी-लिखी  तथा नौकरी में है  तो  क्या हुआ ? माँ-बाप ने कैसे कुलछनी को खाली हाथ  बिदा कर दिया।  हमारे ‘स्टैणर्ड’ के बारे में एक  बार भी नहीं सोचा। आखिर तो उन्हीं की  लड़्की सुख  भोगेगी।”तभी किसी पुरुष  की आवाज ने उस का समर्थन किया। बस फिर क्या था धीरे-धीरे कानाफूसी और खुसर-पुसर होने लगी।वह उन सब की आवाज पहचानने की कोशिश करने लगी। उसे अचछी तरह समझ आ गया था कि वह दहेज के लालची नर-पिशाचों के बीच फँस गई है। उस का दिल जोर-जोर से धड़्कने लगा। उसे ऐसे लगा मानों वह भूखे भेडिये अपनी जीभ लपलपा कर उसे निगल जाना चाहते हैं। मधु मजबूत  निश्चय वाली लड़्की थी वह बुदबुदायी ,”क्या फर्क पड़्ता है यदि सगे -सम्बन्धी ऐसा कहते हैं आखिर  रहना तो उसे रमेश के साथ है।”

वह तो अच्छा कमाता है तथा मधु को भी ऊँची वेतन मिलती है इस प्रकार दहेज की कमी आसानी से पूरी हो जायेगी।” पर उस के आश्चर्य  का ठिकाना न रहा जब नशे में धुत रमेश झूमता-झामता आया तथा माता-पिता के विचारों को दोहराने लगा।

पति के इस प्रकार के व्यवहार को देख उस ने रात रोते-रोते काटी। कब न जाने निद्रा  माँ  ने  अपनी मधुर लोरियों से थपकिया दे कर सुला दिया?प्रातः जब अच्छी तरह धूप खिड़्की से उस के मुँह पर आयी अचानक नींद खुलते ही वह सकपका  गयी। घड़ी पर नजर  पड़ जाने से उस के होश -हवास उड़ गये।

किसी तरह उस ने अपने मन और मस्तिष्क को शान्त किया पर बाहर निकलने पर उसे लगा मानों विरोध की साजिश की बदबू सब ओर फैल गयी।घर के नौकर-चाकर और हर सदस्य उसे अजीब  द्र्ष्टि से देख रहे थे। इस सारे माहौल में केवल एक बूढी सीता काकी के शब्द उस के घावों पर मरहम के समान थे। उस ने मधु को वास्तविकता समझाते हुए कहा,”बहू रानी तुम तुरन्त माता-पिता के पास लौट जाओ। तुम रमेश की पहली पत्नी के बारे में भी नही जानती ? कैसे इन नर पिशाचों ने तेल से उसे जला कर उसे स्टोव दुर्घटना करार कर दिया था।

अपने माता-पिता को वह किसी कठिनाई में नहीं ड़ालना चाहती थी। उस ने मन-ही-मन सोचा ,”अब तो बैंक की छुट्टी खत्म होने वाली है दिन का अधिकतर  समय बैक में बीत जायेगा।वह अपने जीवन को खुद सुखद बनायेगी।जब बैंक से तनख्वाह का मोटा पैकेट लेकर लौटेगी तो सभी अपना बस व्यवहार भूल जायेगें। अचानक सास-ससुर क व्यवहार  मधुर हो उठा तथा बूढी सीता काकी के शब्द उस को स्वपन की तरह लगने लगे।’बेड़ टी’ के समय रमेश के पिता जी मधु को आवाज लगा कर पीठ पर हाथ फेरते हुए ‘बेटी-बेटी’कह कर चाय हाथ से देते।

रमेश  के पिता हल्का-फुल्का मजाक भी करते और कहते,”मधु ,तुम तो हमारी बेटी हो।तुम्हारे घर आने पर मेरी बेटी का शौक पूरा हो गया।

तुम्हारे व्यवहार ने तो मुझे मोह लिया है। इधर रमेश की माँ चाहती कि वह रसोई में उन के पास बैठे। रमेश के पिता चाहते वह उन से  बात-चीत करे। देरी से कमरे में जाने पर रमेश  बड़े  मनोहार से रूठ कर मधु को कहते ,”जाओ मैं तुम से नहीं बोलता।क्या तुम्हें तंग करने में मजा आता है?”

रमेश-मधु के विवाह के बाद उन्हों ने अपने परिचितों को निमन्त्रित नहीं किया था । अतः सब ने मिल कर एक पाँच सितारा होटल में आयोजन करने का मन बनाया। पार्टी के दिन ‘पार्लर’में जाकर उस से तैयारी करवाई। मधु ने अपनी सब से अच्छी साड़ी पहनी तथा ऐसा सिंगार किया कि वह पूर्णमासी के चन्द्र्मा जैसे लग रही थी।  रमेश भी काले सूट में खूब जँच  रहा था। उस के होठों पर मन्द मुस्कान थी । मधु को लग रहा था कि जीवन की सब से अधिक खुशी उसे मिल गई।

धीरे-धीरे सभी मेहमान चले  गये। मधु थकावट का अनुभव कर रही थी। तभी रमेश उस के लिये शरबत का गिलास लाया ।गिलास हाथ में थमा कर रमेश बोला,”मधु इस शरबत को पी लो तुम जीवन की सब थकावट से दूर चली जाओगी।”

मधु ने उसे खुशी-खुशी पी लिया।  पीते ही उसे लगा मानों गर्म-गर्म सीसा उस के गले स नीचे उतर गया हो। अन्धेरा मानों उसे घेरने लगा।वह गहरे कुँए में गिरती जा रही है।

वह चिल्लाई,”रमेश,रमेश मैं गिर रही हूँ मुझे अपनी बाँहों में थाम लो।”उसे समझ नहीं आरहा था उसे क्या हो रहा है? तभी वह जमीन पर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ी और फिर कभी उठ नहीं सकी।पास खड़े  एक रिश्तेदार ने कहा,”अरे डाक्टर को बुलाओ।”

तो दूसरे ने कहा,”इस के प्राण पखेरू उड़ गये।”मधु के माता-पिता आये वह अच्छी तरह से समझ गये उन्हें अब रोने से क्या फायदा? अतः अपनी स्नेह पालिता पुत्री के पार्थिव शरीर को घर दाह संस्कार के लिये ले गये।

तभी गम्भीर मुद्रा में  बूढी सीता काकी अपनी भावनाओं को रोक न सकी और  बिफर उठी”एक और नारी समाज के अत्या चारों की शिकार हो गयी…..”

 

रेखाओं की करवट

आज  छुट्टी का दिन था।

सुबह का नाश्ता खत्म होने पर झूठे बर्तन का ट्रे ले करउष्मा किंचन की तरफ बढ रही थी  तभी अचानक उन्मुक्त को कुछ याद आया ।वह बोला,”अरे! हाँ उष्मा, कल आफिस में मेरे एक पुराने मित्र निखिल का फोन आया था । तुम्हें याद होगा वह देहरादून की घोसी गली में हमारा पड़ोसी था । उस के घर की दीवारों पर अजीब गुलाबी  रंग था। जिसे देख तुम हैरान थी ऐसा रंग घर के लिये कोई चुन सकता है? उन्मुक्त माथे पर शिकन ड़ाल कर  कुछ सोचते हुए बोला,”बड़ा आश्चर्य हो रहा है आज २५ साल बाद उसे मेरी याद कैसे आ गई ? फिर कुछ  चेहरे पर  चंचल  शरारत  भरी   मुस्कान लेकर उन्मुक्त ने चुटकी ली,”भाई ! हमें कौन पड़ोसी मिलने आता है।जरूर अपनी प्यारी भाभी के लिये आ रहा होगा। जिसे उस समय  भी वह कनखियों से देखा करता था!”

उष्मा ने बनावटी झुँझलाहट दिखा कर कहा,”भला मुझे उस से क्या लेना देना?”

अच्छा भाई क्यों नाराज होती हो? मैं तो ऐसे ही कह रहा था. तभी फोन की घन्टी बजी। उन्मुक्त  ने फोन का चोंगा  उठा कर “हेलो!” कहा।

“मैं…… यार! तुम्हारा दोस्त निखिल बोल रहा  हूँ।”

उन्मुक्त ने सोचा छुट्टी के दिन पुराने मित्र के साथ मिल कर खूब मौज-मस्ती करेगें। अतः बोला,”यार! किस ‘फारमैल्टी’ में पड़  रहे हो।भाभी को लेकर सीधे घर आ जाओ। खाना-वाना यहीं करना पुरानी बातों को याद कर खूब मजा आयेगा।

“मैं ‘इफ्क्को-चौक ‘के पास कोठी न० २५ में रहता हूँ घर ढूढ्ने में अगर मुश्किल हुई तो मुझे काल कर लेना मैं पिक कर लूँगा।”कुछ देर में दरवाजे

की घन्टी बजी तो उन्मुक्त ने लपक कर दरवाजा खोला तभी  निखिल और उस की पत्नी  नैनी उन के सामने खड़े थे। दोनों के चेहरे के भाव देख उष्मा हड़्बड़ा गई तथा उस ने दोनों हाथ जोड़ दिये। चाय-काफी के दौरान उष्मा कभी निखिल और कभी उस की पत्नी नैनी को देख रही थी। कितनी नीरवता और खालीपन छाया था उन की आँखों में। उन की बातचीत में अजीब गम्भीरता थी। रूलाई रोकने की कोशिश में उन का गला रूद्ध रहा था। उसे याद आ गया वह २५ साल पुरानी यादें ,बीता हुआ एक-एक  पल नैनी उस की सहेली शादी से पहले एक मान्यता प्राप्त  स्कूल में  गणित पढ़ाती थी। वह स्वतन्त्र विचारों वाले धनी माता-पिता की बेटी थी । हरेक से इधर-उधर चुहलबाजी करती फिरती थी।उस के लिये जीवन केवल मौज-मस्ती के लिये था।स्कूल की हर ‘एक्टीवटी’ में उसे मजा आता था। स्कूल में देरी होने पर कोई परवाह नहीं थी क्यों कि उस का ड्राइवर गाड़ी ले कर उस की इन्तजार करता था। उस की  माँ यदि कुछ कहती तो वह  दो  टूक सा जवाब देती,”माँ मुझे अपना जीवन   अपने तरीके से जीने दो।”

इधर उष्मा अपने माता-पिता की सब से छोटी सन्तान थी जल्दी ही उस की शादी हो गयी और वह गुड़्गाँव आ गई।

नैनी  के नाज़-नखरे को  देखते  हुए  उस के माता-पिता को लड़्का ढूढ्ने में कुछ ज्यादा समय लगा। शादी के बाद उस के पति की पोस्टिंग भी  गुड़्गाँव हो गयी। नैनी शादी के  बाद  केवल एक घरेलू  बन कर रहना नहीं चाहती थी। बात शुरू होते ही वह सब के सामने विचार रखती और कहती ,”औरत बच्चे पैदा करने वाली और उन की देख -भाल करने वाली मशीन नहीं।उसे भी खुली हवा में साँस लेने का अधिकार है पुरुष बहुत स्वार्थी होता है वह नारी का कार्यक्षेत्र घर बता कर अपना मतलब पूरा  करना चाहता है। जिन्द्गी  के अनुभव इन्सान को शिक्षित करते हैं  इस लिये स्त्री को पुरुष की छलावे भरी बातों में आकर अपने जीवन का दायरा छोटा नहीं करना चाहिये। आज की  नारी  स्वतन्त्र है।”

चार सखियाँ क्या जमा हुई नैनी का धुँआ-धार भाषण चालू हो जाता था। उस की तेज़ तरार तर्क पूर्ण बातों को सुन कर किसी ने उसे यह क्या कहा,

“,नैनी ! तुम में तो राजनीतिज्ञ के गुण हैं।”फिर क्या था उस को पंख लग गये।

“वह उत्तेजित हो कर बोली,”क्या आप सच कह  रहें  हैं ?”

बस उन की बात उस के जहन में  बैठ गई । सोते-जागते चुनाव में खड़े होने की योजना बनाने लगी। इसी बीच उस के घर एक बेटी और फिर एक पुत्र ने जन्म लिया ।उस ने लड़्की का नाम वन्या और लड़्के का नाम देव रखा ।उसे  घर संसार में कोई रुचि न थी ।उस का कहना था उस का  दुनिया से जुड़ कर  आत्म-विश्वास भी बढ़ेगा। साथ  ही जीने का उत्साह भी, उस के मन में कुछ कर दिखाने की ललक भी बढेगी ।शोहरत ,दौलत,ऊँचे पद की चाह ने उसे कुछ अन्य सोचने ही न  दिया। घर के काम के लिये उस ने एक बड़ा नौकर रख लिया। उस का नाम कर्मण्य था। वह देखने में शालीन और अच्छे परिवार का लगता था। राजनीति के कामों के द्बाव से अब नैनी को सारा-सारा दिन बाहर ही जाना पड़्ता था।

ऐसे में दोनों बच्चों की देख-भाल कर्मण्य करता था । जयजयकार  और प्रशन्सा  सुन कर तुरन्त  नैनी ने निखिल को फोन किया ,”निखिल तुम्हें एक  बढ़िया खबर सुनानी है.”

“तुम ‘इलेक्शन’ में जीत गयी हो न? “निखिल बोला।

“तुम्हें कैसे पता चला?” नैनी हैरान हो उठी।

“तुम्हारी आवाज की खुशी से मैंने अंदाजा लगाया नैनी।”

“हाँ ! तुम्हारे सिर एक पार्टी ‘ड्यू है।”

“जरूर जरुर ! मैं इस महीने की २५ तारीख को आ रही हूँ। अच्छा है आप उस दिन के लिये टेबुल बुक करा के रख लें।”नैनी उत्साहित हो कर बोली।

पर उन्मुक्त बोला,”नहीं, नहीं, यह पार्टी तो घर पर मिन्नी और कोकिला मेरी दोनों बहनों के साथ होगी।”

हाँलाकि यह विचार नैनी को पसन्द नहीं आया। पर फोन पर कुछ कहना उस ने ठीक न समझा।

इस बीच एक दो बार जब भी वह हमारे घर दिल्ली आई तो मैंने उसे बड़े प्यार से समझाया,”माँजी का स्वर्गवास हो गया है। वन्या अब बड़ी हो रही है। राजनीति के पचड़े को छोड़ कर घर के काम और परिवार की देख भाल में मन लगाओ।”

पर उस की आँखों पर तो राजनीति का काला चश्मा लगा था। बात को टालने के लिये वह कर्मण्य की तारीफ करने लगी। इस प्रकार चिन्ता रहित हो कर वह दिल्ली में राजनीति के कार्य में व्यस्त रही। इधर वन्या बड़ी हो रही थी। कर्मण्य  का  गोरवर्ण और अच्छा व्यवहार उसे लुभाने लगा था।कर्मण्य  का उस से लग कर बैठना, छूना,चिकोटी काटना आदि उसे  ब हुत अच्छा लगने लगा था।

नैनी बीस दिन बाद दिल्ली से राजनीति  के कार्य को निबटा कर घर लौटी तो उस ने देखा हँसमुख वन्या सूखती जा रही है। वह सुस्त और चिड़चिड़ी हो गयी है। पर माँ का ध्यान उधर नहीं गया । वह मन  ही मन  में अपनी बेटी पर विश्वास  बनाये रखना चाहती थी। बस एक दिन फिर भी वह उसे ड़ाक्टर के पास ले गयी ।ड़ाक्टर ने आम कमजोरी बता कर कुछ टानिक  लिख दिये। पर उस से स्वास्थ्य में कुछ फर्क नहीं पड़ा।

एक दिन  सुबह काफी देरी होने पर भी जब वन्या ने दरवाजा नहीं खोला तो नैनी को बहुत हैरानगी हुई।

नैनी ने जब बार-बार दरवाजा  खटखटाया तो आस-पडोस जमा हो गया और दरवाजा जबरदस्ती  खोलने पर वन्या को जमीन पर पड़ा पाया। उस की एक टक खुली मूक निहारती आँखें शायद अब भी माँ के प्यार को ढूढ रही थी।

तभी किसी का ध्यान टेबुल  पर पड़ी चिठ्ठी पर गया,”माँ ! जिस पर तुम ने इतना विश्वास किया। वह मेरा जीवन नष्ट कर गया।”

आज उस नीरवता का कारण, उष्मा के जहन में घूमने लगा। मन में एक टीस सी उठी और अन्तरात्मा चीत्कार कर उठी,”नैनी की एक लापरवाही  से उस के भाग्य की रेखाओं ने करवट ले ली!”