भारतीय इंग्लैड़ में

भारतीय इग्लैड़ में,
इस बार फिर मुझे विदेश जाने का मौका मिला,

मैंने’वीजा’मिलते ही टिकट बुक कराया और निश्चित दिन अत्यन्त उत्साहित हो केमरा कन्धे पर टाँग,सामान को ‘ट्रोली’पर रख कर टर्मिन्स ३ के गेट न० ३ की तरफ मुँह किया। निःसन्देह’इंदिरा गाँधी एयरपोर्ट’में कुछ सुधार और परिवर्तन हुए है। इस कारण यात्रियों के लिये चलने का क्षेत्र लम्बा-चौड़ा हो गया है। पर वयोवृद को व्हील चेयर और बग्गी की सुविधा शुरू से आखिर तक उपलब्ध है। इस के अतिरिक्त जमीन में चलने वाले ‘एस्क्लेटर’दिन-रात यात्रियों को पैदल चलने के कष्ट से बचाते हैं।
इस बार मैं मई के महीने में इग्लैड़ गयी। उस समय भारत में कड़ी गर्मी पड़ रही थी। पर वहाँ हीथरो से बाहर निकलते ही मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब जैसे ही मेरे बेटे की गाड़ी हीथरो से घर की ओर चली। आसमान में उमड़-घुमड़ कर बादल छा गये। थोड़ी देर में बारिश और तेज़ हवा के साथ ओले सब ओर छिटक कर सफेद रंग की चादर बिछाने लगे। इस प्रकार
वहाँ पँहुचते ही वहाँ के बदलते मौसम का पहला नजारा दिखा। वाह! मौसम का क्या परिवर्तन है।?
भारतवासी मूलतः बहुत मेहनती हैं उन्हें कहीं भी जा कर विपत्तियों को सह कर भी काम करना मंजूर
है बशर्ते वह अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें।
६०के दशक में देखें तो इग्लैड़ में डाक्टरों की बहुत कमी थी। इसी कारण मेड़िकल कालेजों से पढ़ कर स्त्री पुरुष चिकित्सक भारत से वहाँ जा कर बस गये। वे चिकित्सक आज तब से स्थायी रूप से इग्लैड़ और उस के इर्द-गिर्द छोटे-छोटे टापूओं में आ कर बस गये। वह डाक्टर पीढी-दर-पीढी वही रहना पसन्द करते हैं।
वही भारतीय जो अपने को भारत में पूर्णतः स्वतन्त्र समझते हैं और स्वतन्त्रता का अर्थ जहाँ-तहाँ गन्दा मचाने को अपनी आजादी मानते हैं। विदेश की भूमि पर उतरते ही उस के कडे कानून से ड़र कर खूब अनुशासित रहते हैं।
विदेशों में हर जगह सी०सी० टी०वी० लगे हैं जो आदमी से अधिक सजगता से काम कर रहे हैं तथा ठीक-ठीक रिपोर्ट पेश करते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी को निर्देश अनुसार नहीं लगाता तो उसे उचित समय पर पेश हो कर कचहरी में जुर्माना भरना पड़्ता है। वैसे सरकार भी जनता को बस इत्यादि इस्तेमाल करने के लिये प्रोत्साहित करती रहती है जिस से पार्किग की समस्या ठीक हो जाये।
सालों से रहते-रहते वहाँ भारतीय सब रीति रिवाज और परम्पराओं का अनुसरण करने लग गये हैं। मौसम बदलने पर ‘स्ट्रीट बार्बक्यू’ मनाये जाते हैं इसे मनाने के लिये सभी अपने परिवार के खाने पीने की व्यवस्था अपने से करते हैं। वहाँ रहने वाले अधिकतर सभी भारतीय और विदेशी अपने घर में,”स्टैडिंग-बाबर्क्यू” रखते हैं। पुरूष-वर्ग उन पर खाना बनाता है या घर से बना हुआ खाना लाकर उसे गर्म करते हैं।इन चूल्हों पर “भूनी तन्दूरी मुर्गी”और’सासेज़’ बनाये जाते हैं।कुछ लोग जो निरामिष हैं बिना छिलका उतारे छूरी काँटे से बिना नमक के उन्हें खाते हैं।
IMG_6214सब लोग आपस में खूब जोश से मिलते हैं। सभी अपने देश के अनेक प्रकार की पुड़िग,केक और आईस क्रीम बनाते और दूसरों को खिलाते हैं। मैंने भी इस बार वहाँ मौजूद होने के कारण आईसक्रीम का खूब मजा उठाया।
बार्बक्यू रात भर चलता है जब सब अपना-अपना खाना खा लेते हैं तो उसके बाद सभी पुड़िग निकालते हैं।
इस बार जब मैं भी वहाँ थी अचानक बारिश शुरू हो गयी और सारे कार्यक्रम में रूकावट आ गयी।
इस परम्परा का सब से बड़ा लाभ यह है कि आस-पास के सभी निवासियों से सब की जान पहचान हो जाती है। इस के अतिरिक्त बच्चे अपना समय खेल-कूद में बिताते हैं। औरतें अपने देश का सामूहिक नृत्य दिखाती हैं।
वहाँ भारत से गये ड़ाक्टर बीमारों का उपचार करने के अलावा,हर काम करते हैं उदाहरण के लिये वह घर के जूठे बर्तन धो कर भी लगाते हैं। कूड़े का ड्र्म हर सप्ताह में एक निश्चित दिन घर की बाहर रखते हैं।जिसे म्यूस्पिल्टी के कर्मचारी सुबह ही अपने बड़े से ट्र्कों में शहर से दूर ले जाते हैं। भारतीय विदेश में रह कर वहाँ का अनुशासन पूर्णरूप से पालन करते हैं।
सभी घरों के पीछे और सामने खुली जगह है जहाँ बच्चे सुरक्षित खेल सकते हैं।यहाँ के निवासी वहीं गुलाब के पौधे,नाशपाती ,स्ट्र्रोबरी और सेब इत्यादि के पेड़ लगाते हैं। मौसम आने पर पेड़ पूरी तरह से फलों से लद जाते हैं।
यहाँ सम्पति का दाम बहुत ऊँचा है पर फिर भी वहाँ की अच्छाईयों को देख कर भारतीय उन्हें खरीदने के लिये दिन रात मेहनत करते हैं।जी०पी०(सामान्य चिकित्सक जो सब रोगों का उपचार करने का प्रयास करते हैं)की आय बहुत ज्यादा होती है।सरकार एन० एच० एस० पर स्वास्थ्य की देख भाल का काम छोड़ देती है।
मेरे एक परिचित चिकित्सक हैं उन्होंने ‘लाडर्ज’ का घर कैन्ट में खरीदा है। वह कैन्ट के धनाढय परिवार में से एक हैं। वे पिछले ४० सालों से कैन्ट में रहते हैं।अच्छा तो मैं जिन भारतीय परिचित ड़ाक्टर साहब के व्दारा कैन्ट में घर खरीदने की बात कर रही हूँ। उन का बगीचा प्रवेश व्दार से पृथ्वी की अलग-अलग सतह पर पर बना है। ऊपर की सतह में खुला घास का मैदान है जिस पर उन्होंने ‘स्विमिंग पूल’बनाया है उसी सतह पर उन्होंने गर्मी में बाहर खाना खाने के लिये मेज़ कुर्सी लगवा दी है। बच्चों के खेलने के लिये ‘बाऊसिंग-कासल’बनवाया है। सभी की देखभाल सपरिवार वह खुद करते हैं।
उन्होंने एक खूब मोटे तने वाले वृक्ष पर आदि मानव के निवास स्थान का सा बच्चों के लिये घर बनवा दिया है। जहाँ बच्चे छुट्टी के दिन आदि मानव की तरह घर बना कर रहते हैं।
‘स्विंग-पूल’और ‘सोना- बाथ’के साथ बीच में खुली गैलरी है जिस में परिवार के बच्चे अपना खाली समय चित्रकला इत्यादि में बिताते हैं। हम भारतीय वहाँ रहने वाले दूसरे भारतीय से रहन सहन में होड़ लगा कर स्तर ऊँचा करना चाहता है।पर फिर भी वह आपनी प्राचीन संस्कृति और संस्कारों को जीवित रखने के लिये गॄह-प्रवेश,अन्नप्राषण,जनेऊ आदि अवसरों को धूमधाम से मनाता है जिस में वह अपने भारतीय सगे-सम्बन्धियों को भारत से भी निमन्त्रित करते हैं। वहाँ रहने वाले सभी भारतीय जी तोड़ कर मेहनत करते हैं। धनी बनने की होड़ हमेशा उन के मन में बनी रहती है।
सच में वह फूलों से लदे पौधों वाला सुन्दर देश दर्शनीय है। उस देश के विकास में भारतीय भाई दिन-रात
की चिन्ता नहीं करते उसी का परिणाम है कि यह देश खूब विकसित हो गया है और अपनी ओर सब को आकर्षित करता है।
लेखिका–
श्री मती विनोद पड़ित,
दूरभाष-०१२४-४०४६९४