मुझ से दोस्ती करोगे

friendship-day मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसे हर समय साथ की जरूरत होती है। बाल्यकाल से वह अपनी आयु और वातावारण के अनुसार दोस्ती करता है। कभी-कभी जो व्यक्ति कहता है कि उस की पसन्द और रूचि वाला दोस्त नहीं मिलता पर ऐसा व्यक्ति एक दिन तो अकेलेपन का अनुभव करने लगता है और जीवन से निराश हो जाता है । दोस्ती वास्तव में केवल रिश्ता ही नहीं बल्कि जीवन का एक वरदान है। कुछ लोग सोचते हैं कि दूfriendship-dayमनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसे हर समय साथ की जरूरत होती है। बाल्यकाल से वह अपनी आयु और वातावारण के अनुसार दोस्ती करता है। कभी-कभी जो व्यक्ति कहता है कि उस की पसन्द और रूचि वाला दोस्त नहीं मिलता पर ऐसा व्यक्ति एक दिन तो अकेलेपन का अनुभव करने लगता है और जीवन से निराश हो जाता है । दोस्ती वास्तव में केवल रिश्ता ही नहीं बल्कि जीवन का एक वरदान है। कुछ लोग सोचते हैं कि दूसरे उन्हें दोस्त बनायेगें यह विचार सर्वथा गल्त है।जीवन भर हमें अपना हाथ दूसरों के आगे दोस्ती के लिये बढ़ाना होता है। अगर हम पहल करते हैं तभी हमारी दोस्तों की लिस्ट लम्बी होती है। नहीं तो हम पूरी तरह निराश हो जाते हैं और मन ही मन अपने को कोसते रहते हैं।

जीवन में सभी व्यक्ति एक ही तरह के नहीं होते। अतः आज हम पता लगाने की कोशिश करेगें कि आप जानपहचान वाले लोगों में कितने लोक प्रिय हैं जिस से हर कोई आप से दोस्ती करना चाहे।
आज हम विचार करेगें आखिर दो लोगों में दोस्ती क्यों होती है? जो इस प्रकार है–
हमेशा खुश रहने की कोशिश करना जरूरी है। चेहरे पर मुस्कान अपनी ओर दूसरों को आकर्षित करती है। मुस्कराहट चेहरे को दिन-दिन सुन्दर करती है।
जब कोई कुछ कह रहा हो तो उस में रूचि दिखा कर सुनना चाहिये । अगर विषय पसंद का नहीं हो तो भी उस में रुचि दिखानी चाहिये। सुनाने वाले को लगना चाहिये कि उस की बात सुन कर खूब मजा आ रहा है। बात सुनते वक्त अपना धीरज बनाये रखना चाहिये। कभी उतावला नहीं होना चाहिये कि बात कब खत्म होगी? धीरज़ से बात सुनने वाले के दोस्तों की संख्या असंख्य होती है।
प्रशंसा करने में कंजूसी मत नहीं करनी चाहिये। दूसरे की छोटी-से-छोटी उपलब्धी पर भी उस की भूरि-भूरि प्रशन्सा करनी चाहिये।
सामान्यतः हम लोगों को मिलने के बाद सोचते हैं उस से अब हमें कोई काम नहीं इस लिये नाम भूल जाते हैं। नाम से बुलाने से दूसरे को अधिक आत्मीयता लगती है या यूँ कहें नजदीकी का अनुभव होता है।
अगर यह सब गुर काम ना आयें तो सामान्य बने रहें। जबरदस्ती स्वाभाविक बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिये । बल्कि कोशिश करनी चाहिये कि लोग तुम्हें अपना दोस्त बनाने को उतावले हों।
हर कोई मन में दोस्त की परिभाषा सोच कर रखता है। अधिकतर लोग सोचते हैं–
दोस्त हर मौके पर साथ दे। अगर सच में उस की सख्त जरूरत हो तो वह साथ हो।
सच्चा दोस्त वो होता है जिसे मन की बात बता सकें। उसे जो भी बात कहें उस का मजाक न बनाये न दूसरों को बात बता कर उस का ढिढोरा न दे।
विश्वसनीय हो। जिस को कोई बात बताने पर हर वक्त ड़र न लगा रहे कि वह सब को बता देगा। उसे ही लोग मजाक में कहते हैं कि उस के पेट में दूसरों को बात सुनाने के लिये पेट में दर्द न हो। बात को अपने तक सीमित रख सके। शान्त स्वभाव को हो।
अलोचना से दूर रहे। पर समय-समय पर उचित और उपयोगी सुझाव दे।
सामान्यतः चुपचाप बात सुन ले।
दोस्ती हो जाने पर उसे निभाना बहुत जरूरी है। हमेशा सकात्मारक सोच रखने पर दोस्त अधिक होते हैं । जो निराशा को पास फटकने न दें। ऐसे भाव चेहरे पर बनाये रक्खे कि विश्वास किया जा सके। मित्र के आत्मविश्वास को बनाये रखने के लिये अपने जीवन की घटनायें उसे सुनाना लाभकारी होता है। मित्रता को लम्बे समय तक बनाये रखने के लिये उसे यह दर्शाना जरूरी है कि कमियाँ हर एक में होती हैं।
बस यह सरल और सीधे-साधे मूल मन्त्रों को याद रख कर निश्चित रूप से सब का प्रिय बना जा सकता है।सरे उन्हें दोस्त बनायेगें यह विचार सर्वथा गल्त है।जीवन भर हमें अपना हाथ दूसरों के आगे दोस्ती के लिये बढ़ाना होता है। अगर हम पहल करते हैं तभी हमारी दोस्तों की लिस्ट लम्बी होती है। नहीं तो हम पूरी तरह निराश हो जाते हैं और मन ही मन अपने को कोसते रहते हैं।
जीवन में सभी व्यक्ति एक ही तरह के नहीं होते। अतः आज हम पता लगाने की कोशिश करेगें कि आप जानपहचान वाले लोगों में कितने लोक प्रिय हैं जिस से हर कोई आप से दोस्ती करना चाहे।
आज हम विचार करेगें आखिर दो लोगों में दोस्ती क्यों होती है? जो इस प्रकार है–
हमेशा खुश रहने की कोशिश करना जरूरी है। चेहरे पर मुस्कान अपनी ओर दूसरों को आकर्षित करती है। मुस्कराहट चेहरे को दिन-दिन सुन्दर करती है।
जब कोई कुछ कह रहा हो तो उस में रूचि दिखा कर सुनना चाहिये । अगर विषय पसंद का नहीं हो तो भी उस में रुचि दिखानी चाहिये। सुनाने वाले को लगना चाहिये कि उस की बात सुन कर खूब मजा आ रहा है। बात सुनते वक्त अपना धीरज बनाये रखना चाहिये। कभी उतावला नहीं होना चाहिये कि बात कब खत्म होगी? धीरज़ से बात सुनने वाले के दोस्तों की संख्या असंख्य होती है।
प्रशंसा करने में कंजूसी मत नहीं करनी चाहिये। दूसरे की छोटी-से-छोटी उपलब्धी पर भी उस की भूरि-भूरि प्रशन्सा करनी चाहिये।
सामान्यतः हम लोगों को मिलने के बाद सोचते हैं उस से अब हमें कोई काम नहीं इस लिये नाम भूल जाते हैं। नाम से बुलाने से दूसरे को अधिक आत्मीयता लगती है या यूँ कहें नजदीकी का अनुभव होता है।
अगर यह सब गुर काम ना आयें तो सामान्य बने रहें। जबरदस्ती स्वाभाविक बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिये । बल्कि कोशिश करनी चाहिये कि लोग तुम्हें अपना दोस्त बनाने को उतावले हों।
हर कोई मन में दोस्त की परिभाषा सोच कर रखता है। अधिकतर लोग सोचते हैं–
दोस्त हर मौके पर साथ दे। अगर सच में उस की सख्त जरूरत हो तो वह साथ हो।
सच्चा दोस्त वो होता है जिसे मन की बात बता सकें। उसे जो भी बात कहें उस का मजाक न बनाये न दूसरों को बात बता कर उस का ढिढोरा न दे।
विश्वसनीय हो। जिस को कोई बात बताने पर हर वक्त ड़र न लगा रहे कि वह सब को बता देगा। उसे ही लोग मजाक में कहते हैं कि उस के पेट में दूसरों को बात सुनाने के लिये पेट में दर्द न हो। बात को अपने तक सीमित रख सके। शान्त स्वभाव को हो।
अलोचना से दूर रहे। पर समय-समय पर उचित और उपयोगी सुझाव दे।
सामान्यतः चुपचाप बात सुन ले।
दोस्ती हो जाने पर उसे निभाना बहुत जरूरी है। हमेशा सकात्मारक सोच रखने पर दोस्त अधिक होते हैं । जो निराशा को पास फटकने न दें। ऐसे भाव चेहरे पर बनाये रक्खे कि विश्वास किया जा सके। मित्र के आत्मविश्वास को बनाये रखने के लिये अपने जीवन की घटनायें उसे सुनाना लाभकारी होता है। मित्रता को लम्बे समय तक बनाये रखने के लिये उसे यह दर्शाना जरूरी है कि कमियाँ हर एक में होती हैं।
बस यह सरल और सीधे-साधे मूल मन्त्रों को याद रख कर निश्चित रूप से सब का प्रिय बना जा सकता है।



2 टिप्पणियाँ

  1. Annapurna Bajpai wrote:

    बहुत सटीक और ज्ञान वर्धक जानकारी