मेरी माँ,प्यारी माँ

indian-motherमेरी माँ का निधन मेरे सामने एक रिक्त स्थान छोड़ गया है। जिस की भरपाई मुश्किल है।यधपि उन्होंने किसी नौकरी या व्यवसाय को नहीं अपनाया। पर फिर ही भी उन्होंने जो  भी काम किया।उस में पूर्णतः सफल हुई। इतना सेवा भाव था उन में  कि उन्हें ‘होली-फैमली’ अस्पताल ने ड़ाक्टरी न पढ़े होने पर भी उन के सेवा भाव को देख ड़ाक्टर के पद पर कार्य करने को निमंन्त्रित किया ।माँ के चले जाने का समाचार ,फोन पर पा कर मुझे जोर से झटका लगा जैसे दुनिया में कुछ बचा ही नहीं पर आज भी उन के गुरूग्रन्थ  के कथन जो उस समय भी उपयोगी थे आज भी । मेरे बच्चे उन के आशीर्वाद स्वरूप खूब सफल हैं आज भी बात करते-करते वे माँ व्दारा गुरू ग्रन्थ साहबके दोहराये कथन याद करते हैं। मेरी माँ जीवन के कौन से क्षेत्र में सफल नहीं हुई? अग्रेजों के राज्य-काल में उन  के पिता आई० जी० थे.तब ब्रम्हा भारत का एक भाग था उस समय वह ‘कान्वेन्ट’ में पढी और बड़ी हुई। अंग्रेजी वह ब हुत अच्छी बोलती थी और शादी के बाद पंजाब के ‘डुड़्याल’ नाम के छोटे से गाँव शादी हुई पर गाँव के  के  हर तरीके को सीखते हुए बिना किसी  शिकायत से रही। इतनी मिलनसार और संस्कारी थी वे। उन की गायकी ब हुत अच्छी  थी बिना संगीत सीखे गीत ब हुत  अच्छे से गाती थी। वह वायलन भी ब हुत अच्छा बजाती थी।भारत में जब हमारे पिता जी आये तब  हम सपरिवार देहरादून आ गये।अपने घर का काम करते-करते जब मधुर स्वर में गाती थी  स्वर में वह  कि राह चलते रुक कर लोग उन का गाना सुनने लगते थे। इतना मधुर था उन का संगीत। कुछ  पडोसी तो उन की तुलना लता मंगेश्वर से करते थे। उन के व्यक्तित्व को देख कर लोग माँ मॄणमयी की भूल खा जाते थे।  इतना आकर्षक था उन का रूप। श्वेत-वर्ण, उच्च-भाल और मनोहर बातचीत क्या कहने थे उन के? उन की बातचीत हर एक को अपनी तरफ आकर्षित कर लेती थी एक बार स्वर्गवासी स्वामी  सत्यानन्द ने  उन से कहा था उन अगर वह गृहस्थी का मोह छोड़ कर एक दिन के लिये भी, ‘योग’ ले लो तो हजारों  की तहदाद में साधक श्रधालु उन के पीछे चल पड़े।पर उन्होंने अपने कत्तर्व्य  को सब से आगे रक्खा। पति व परिवार की सेवा उन के जीवन का एक  मात्र  उददेशय  था।वृद्धावस्था में हमारे पिताजी को अधरंग हो गया। ऐसे कष्ट के समय उन्होंने पल भर के लिये उन्हें नहीं छोड़ा और उन की सेवा की।ऐसी महानता उन में कूट-कूट कर भरी थी। प्रभु कृष्ण की वह उपासिका थी। उन के जीवन काल में उन के घर में ताला लगाने की जरूरत नहीं थी। भले ही किसी के घर चोर आये।पर वह तो गिरधर गोपाल की कॄपा से सदैव सुरक्षित थी।उन्होंने अपने जीवन काल में अपने को कभी अकेला नहीं पाया क्यों कि वह तो मस्त रहती  थी। कृष्ण मनोहारी की आराधना में जिस ने अपनी छाया को पल भर के लिये नहीं छोड़ा । जब-जब मुझे  उस महान व्यकितव की याद आती है  मेरे नेत्र अश्रुपूरित हो जाते हैं और श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है।  आजकल युग में मानव जीवन सभी बुराइयों से युक्त है पर ऐसे समय में भी वह साधिका सा जीवन बिताती थी। ऐसी थी मेरी माँ, उस माँ को कोटि-कोटि नमस्कार



2 टिप्पणियाँ

  1. शांति पुरोहित wrote:

    विनी मेम आपका ये आर्टिकल पढकर मुझे मेरी माँ याद आगयी| कुछ एसी ही थी मेरी मा भी|आपकी माँ के बारे पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई कि वो कितनी महान थी |