सरकार का एक प्रयास, महिलाओं का अपना बैंक

00032949आज ‘इलेक्शन’,का समय है। हर पार्टी कुछ ऐसा कर दिखाना चाहती  है जो दूसरे से अलग हो तथा मंच  पर खडे हो कर कह सके कि उस ने पिछले सालों में ब हुत किया है और कुछ नया  कर दिखाने वाली है।ऐसा ही एक प्रयास  महिलाओं के लिये बैंक है।कहा जा रहा कि महिलाओं को  आत्म-निर्भर  बनाने का एक प्रयत्न है। इसी विचार के अन्तर्गत हमारे शहर की ‘पीचट्री’ नामक बिल्डिग में एक बैक महिलाओं के लिये खोला गया है।अब तो धीरे-धीरे सब ओर ऐसे बैंक दिखायी देगें।

अगर देखा जाये तो यह प्रयास स्त्रियों को आत्म निर्भर बनाने के लिये है।यधपि हमारे बैकों में ऊँची पोजिशन पर महिलाये बैठी  हैं  पर   आज  अगर एक स्त्री को बैक में एकाउन्ट खोलना हो तो सरल नहीं।

इन बैकों के खुलने से कोई भी स्त्री छोटे-से-छोटा कार्य अपनी जीविका चलाने के लिये कर सकती है।अगर वह रसोई खोलना चाहती है तो उस के लिये उसे ‘लोन’ मिल जाता है।वहाँ वह खाना बना कर ,या बनवा कर लोगों को खिला कर ईमानदारी के पैसे कमा कर अपना भरण-पोषण कर, स्वाभिमान से जी सकती है।

आज जब नारी आँफिस में काम करने निकलती है तो उसे अपने  बच्चों को देखने के लिये किसी की जरूरत होती है।पर जिन स्त्रियों पर परिवार की लम्बी-चौड़ी जिम्मेदारी नहीं वह बैक से  पैसे उधार ले कर ‘डे -केयर,’ चला सकती हैं. धीरे धीरे बैंक का ‘लोन’  भी दे सकती हैं।अभी तो यह इन बैंकों की मात्र परीक्षा है देखते हैं यह कितने सफल होते हैं?

इस सब की ज्यादा जरुरत गाँव  में है। जहाँ अशिक्षा और निर्धनता का राज्य सदियों से है।वहाँ कि स्त्रियों के मन में अन्ध विश्वास और अशिक्षा ने अपना फन फैलाया हुआ है।जिस दिन यह प्रयास गाँव  में सफल होगा तभी इस प्रयास को सफल माना जायेगा।

मुझे तो एक कथन याद आ रहा है–“आगे-आगे देखिये होता है क्या?” बस भविष्य की इन्तजार रहेगी।